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Flashback

A presentation by Yashoda Singh and Lakhmi Chand Kohli, writers and practitioners with the LNJP and Dakshinpuri Labs, respectively, at the Pukar Institute, Bombay, in January 2005.



बड़े बड़े शहरों में कुछ नम बातें

 
सायबर मोहल्ला कब बना था?
शुरु में उसकी क्या प्रक्रिया थी?
 
सायबर मौहल्ला की शुरुआत हुई आज से 4 साल पहले यानि सन 2001 में। शुरु में उसकी प्रक्रिया थी तरह तरह से शहर को देखना और लोगों को जोड़ना। अपने आस पास दबी हुई कहानियों को  उभारना  और एक ऐसी जगह बनाना जहां लोग अपने किस्से कहानियों को एक दूसरे से बांट पांए। एक ऐसी जगह खुद से बनाये जहां उनकी बातों की गर्माई हो,और वो अपनी बैचेनी को एक दूसरे से बयां कर सकें। शुरु में कुछ सोच और समझ थी की शहर को कैसे समझा जा सकता है पर हम शहर  को बदलना नही चाहते, हमारी बस यही सोच है की हमारे आस पास का माहौल और शहर कैसे एक दूसरे से जुड़ता है? धीरे धीरे शुरुआती दौर में बदलाव आने लगा। पर अब जुड़ाव के साथ फैलाव भी जुड़ गया है।आज सायबरमोहल्ला के फैलाव मे कई परतें चढ़ चुकी हैं।

जिसके हिस्सेदार या साथीदार लगभग 50_60 लोग है। अलग अलग लोग, अलग अलग प्रक्रिया और अलग अलग सोच मे बहुत कुछ होता है जिसे एक दूसरे से बातचीत का रिश्ता बनाकर बयां किया जाता है। जहां सुनने वाला और सुनाने वाला दोनो ही इस समझ के हिस्सेदार होते हैं।    

हमारी अपनी लोकेल्टी हमे क्या देती है और उसमे किस तरह के एहसास घुले होते हैं?

इन एहसासो को उभार पाना और समझ पाना शायद तभी मुमकिन होता है जब हम कोई ऐसा दौर चलाएं जिसमे बातचीत का, शख़्सियत का, जगह का माहौल का अपना ही तालमेल हो।         

अब सायबरमौहल्ला एक ऐसी जगह बन चुका है जहां हमउम्र के साथीयो के शहर को देखने, सोचने, सुनने, समझने, कहने के सफर से अपनी बात को रखने और  एक संदर्भ बनाने का नज़रिया मिला।    

सबसे पहले इस प्रक्रिया की शुरुआत हुई  L.N.J.P. Colony  में। जो कि 25_30 साल पुरानी  है। जो दिल्ली के  इरविन होस्पिटल के पास बसी हुई है। वहां पर शुरुआत हुई एक कंप्यूघर की  जहां शुरु मे 10 लोग जुड़े। अपनी आस पास की जिन्दगियां यानि अपनी लोकेल्टी की रोज़मर्रा के लिखने की शुरुआत हुई । जिसमे बहुत लोग जुड़े और  कई इस जगह को छोड़ कर चले गए। जिसमे उनकी ही कुछ अपनी अपनी वज़हें थीं।  लेकिन प्रक्रियाऔ' का ये कारवां यूहीं चलता रहा और  साथ ही इन सब चीज़ों का फैलाव भी बढ़ा। जिसके माध्यम से दक्षिण पुरी मे एक और Compughar खुला जिसमे  L.N.J.P. के कुछ साथी  अपने शुरुआती अनुभव  उन्हें सुनाते और उनके सुनते।

ये सिलसिला शुरु हुआ सन् 2002 मे। जिसके चलते चलते  एक  नींव  और रखी गई  नगंलामाछी  जहां हमारे दोनो लैब के साथीयों ने सुनने सुनाने का सिलसिला जारी रखा।    

कंप्यूघर में क्या क्या होता है?

कंप्यूघर में रोज़ 15 से 20 लोग 5 से 6 घण्टे बिताते हैं। जिसमे वो अपना कुछ लिखकर लाते हैं। और फिर आपस मे बैठकर एक दूसरे को लेख सुनाते हैं जिसे सभी लोग बड़े ही ध्यान से सुनते हैं और फिर जिसने लेख सुनाया है उसे सभी कुछ ना कुछ उसके लेख से Related बातें बताते हैं। जैसे उस के इस लेख में क्या बढ़िया था क्या था जिसे वो और भी उभार सकता था। क्या था जिसे उसने छोड़ दिया है। खासकर बातचीत उस पहलू पर होती है कि लेख अपने आस पास के माहौल से कौनसी वो छोटी सी खासियत को उभार पा रहा है जिसे हम अपनी रोज़र्मरा में अनदेखा कर देते हैं। इन्ही मे शामिल हैं हमारे इनटरव्यूज़ यानि अपनी लोकेल्टी से बाते। जिनको हम Recorder के ज़रिये  रिकोर्डर करके उन्हें अपनी बातचीत में शामिल करते हैं और जिसमें उन्हीं के शब्द और एहसास घुले होते हैं हैं।  इन्हीं से जुड़ी हुई है हमारी फोटोग्राफी जैसे हम अपनी लोकेल्टी को फोटो के ज़रिये कैसे देख सकते हैं?

हमारी लोकोल्टी में वो कौनसी जगहें होती हैं जहां बातचीत का माहौल बनता है जैसे Public Space यानि सांझी जगह जहां पर लोग कुछ देर सुकुन से बैठकर अपने काम, घर, त्यौहार और अपनी यादों को अपनी बातों में संजोते हैं। पर वो किस्से कहीं गुम ना हो जाएं लेकिन अगर सोचा जाए तो मुहं जुबानी किस्से कभी गुम नही होते वो इधर से उधर घूमते है हमारी बातों के ज़रिये यानि सफ़र करते हैं। ये तो हुई बात उन रिश्तो की जो एक इंसान से एक इंसान का होता है यानि एहसासो कि दुनिया का एक जुड़ाव।                   

पर हम Computer से भी जुड़े हुए हैं जिसमें हम Animation, Story Board और Images बनाते है और अपने ही लेखो को Type करते हैं और डिज़ाइन करते हैं। हम इस टैकनॉल्जी कि दुनिया को कितना आसान या साधारण बना सकते हैं। 

Internet बाहरी आंखें जिनके साथ रिश्ता बनाना  अपने आप मे एक ऐसा संदर्भ होता है जिसे मजबूती बांधें रखती है। नैट से बातचीत और अपने आपको दर्शाना बड़ा ही आसान हो जाता है। नैट पर हमारे लेख और एनिमेशन होते हैं जिसके माध्यम से बाहरी आंखें हमे देखती और हम से जुड़ती हैं। अपने सवाल हमे भेजती हैं बातचीत करती हैं।जिससे अपने ही कार्यो को नयापन देने हमे एक नई सोच मिलती है । जिसमे काफी कुछ जुड़ा होता हे जैसे Publication और Blog...    

Blog क्या हे?

हमारे कुछ साथी Liverpool गए। Liverpool एक ऐसी जगह है जहां पहले कुछ लोग रहते थे वो उस जगह को छोड़ कर चले गए। अब वहां पर काफी बड़ी कंपनियो का माल आता है। जो लोग वहां पर रहते हैं अब उनके लिये ऐसा कोई खासा काम नही रह गया हे काम ज्यादातर बड़ी बड़ी मशीनो ने संभाल लिया है। जिसकी वज़ह से वो अपनी ज़िन्दगी को थमा सा महसूस करते हैं। और कुछ कुछ हमारी तरह ही वहां भी कुछ लोग इस तरह का काम करते हैं जैसे लेख लिखना फोटो खिंचना उनके पास अपना काफी सामान था पर वो ये नही समझ पा रहे थे कि उनको रुप कैसे  दें?

वहां पर  चुनौती थी की उनका किस तरह का रिश्ता बने उन साथीयो से भी जिनकी छवि कुछ साथी अपने साथ वहां लेकर गए थे ?
        
इसलिये सोचा कि Blog बनाये। जहां उनके हर लेख पर हमारी सीधी बातचीत का रिश्ता बन सके। वहां वो अपने लेख लिख कर Blog
पर डालते और यहां India में बैठे हमारे साथी उनसे  Sharing का रिश्ता बनाते। और बातचीत का दौर शुरु होता हम उनके लेख के ज़रिये वहां  घूमते और वो यहां। उनकी एक लाइन थी:

"लोग गले मिलते हैं और अपने अपने रास्ते चले जाते हैं"

इस लाइन को लेकर उन्होने एक लोकेल्टी Event किया। जिसमे बातचीत का माहौल उभरा और उसी माहौल को एक रुप दिया और एक  Booklet बनाई।     

ऐसे ही एक और संदर्भ बनाने हमारे कुछ साथी Gujraat गए। जो दो तीन बार पहले भी जा चुके थे गुजरात में। पर वहां पर लोग ये नही जानते थे की वहां सुनने सुनाने के कमरे मे होता क्या है? तब ये सवाल आया कि लैब लोकेल्टी मे क्या छाप छोड़ता है? इस सवाल को दिमाग मे रखते हुये हमने सोचा की लैब की ही कुछ क्रियाऔ को लेकर लोकेल्टी मे एक रंगारंग क्रार्यक्रम किया जाय यानि की दीवारों पर Painting वहां हमने कई जगह चुनी जिन मे शामिल था एक बन्द घर का दरवाज़ा। एक ऐसा घर जो लम्बे अरसे से बन्द पड़ा था और जिस पर धूल जाले लगे हुए थे।जिसको लोग घड़ीभर भी रुककर नही देखते थे।  वहां हमने सोचा की एक महिला का पूरा दिन यानि की वो सुबह से रात तक क्या क्या करती है? हम वहां पर अन्दर दबी परतों को आकार देना चाहते थे। जिससे लोगो को भी एक नज़रिया मिले उस दरवाज़े को देखने का और उसपर एक लाइन दी "क्या आप भी हमसे अपना कोई दिन बांटना चाहेगें?"

दीवार पर लिखने का मतलब था की वहां से गुज़रने या रहने वाले लोग उस दरवाजे को देखकर क्या बाते करते होगें और उस जगह पर क्या क्या बदलाव आने लगेगा? Public Space में कोई ऐसी जगह जो बातचीत का ज़रिया बनी और वहां की कहानियों की आरकाईव का हिस्सेदार बनी ।

ऐसे ही हमने वहां पर कई जगह ये Wall Writing की। और उस जगह के बदलाव को महसूस किया।

कुछ फ़ौर्म्ज़

Broadsheet, जो 70 लोगो के प्रयोगो का नतीजा है। हम हर 40 दिन मे एक Wall Magzine निकालते हैं जो हमारी Locality के अलग अलग  हिस्सो मे जाती है। पर वो एक ही लैब के कार्यो को दर्शाती है पर ऐसी कौनसी Form हो जिसमे CyberMohalla ke तीनो लैबो के खानो की खुशबु हो तब सोचा गया की  एक ऐसी Form हो जिसमे तीनो लैब के हर तीन महीने के बदलाव को दिखाया जा सके।
     
अगर कोई CM से तीनो लैबो को देख रहा है पर वो ये नही समझ पा रहा की ये तीन महीनो मे जो मज़ेदार चीजें हो रही  है वो क्या है और मे उसमे कैसे जुड़ सकता हूं?

शायद Broadsheet वो Platform है जहां पर आकर ये सब चीजें रुकती हैं और मिलती हैं  और फिर सफ़र करने लगती हैं  आप जैसे दोस्तों की तलाश में।

... क्योंकि CM कहता है की "हम सांस लेते ही नही सांस छोड़ते भी हैं"....

January 2005

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