दोहराने की सरहदें
राकेश खैरालिया
चंद ज़रूरतों के बंधन में लिपटे रहने के बावजूद इस हसीन दुनिया में सांस लेने को जी चाहता है।
एक चटकारती आवाज़ मन में गूँजती है: "इस समाज के बाहर का जीना भी कोई जीवन है?"
समाज में अपने वजूद को पुख्ता करने में हर दिन बीतता जाता है। ज़िंदगी कहानियाँ बुनती रहती है, अपने जी पाने की वजह बनाने के लिए। समाज बना है सुखमय और सुंदर जीवन जी पाने की माँग पर। यहाँ हर भावना, हर जज़्बा अनमोल है। कोई अपने समय से रिश्ता रख कर किसी ख़्याली बुनाई में जीता रहता है, अपने आसपास में ढल रहा होता है।
शहर की जुस्तजू में शरीक होते शख़्स बौखलाती भीड़ के आलम में खो जाते हैं। वो अपने वजूद की सरहदों के ख़ुद ही निगहबान होते हैं। ये चौकन्नापन उन्हें उनकी जगह में महफ़ूज़ रखता है।
भीड़ के बीच हो रही नज़रों के टकराव में कुछ स्पर्श एक शख़्स से दूसरे शख़्स के भीतर हलचल पैदा करते हैं। जैसे बिना पासवर्ड के लोग एक-दूसरे को इस अजनबी शहर की भीड़ में ढूँढ रहे हों।
अगर इनकी गूँज सुन सकते हो तो सुनो, अगर इनकी परख किसी एहसास से कर सकते हो तो करो। वक़्त के किसी टुकड़े की परतों में तैरती सपनों की, चाहतों की पुकार को जियो और अपने जीवन में गिरती रोज़मर्रा की टेंशन की दस्तकों को मत ठुकराओ।
जहाँ रोज़मर्रा अपने अतीत की अंगुलियों को पकड़े जगह, समय, माहौल की आवाज़ों से मुखातिब होता रहता है, वहीं कल्पनाएँ अपने बंद दरवाज़ों पर रोज़मर्रा की आहटें महसूस कर के जीवन के फ़लसफ़ों का स्वाद चखा देती हैं। एक अदृश्य गति के घेरे मे अंकुरित हो रहे हम किसी विशालकाय पेड़ की शाखाओं की भांति फैलाव की ओर लगातार बढ़ते रहते हैं।
हम जो देख रहे होते हैं, जो महसूस कर रहे होते हैं, उसके पीछे एक असीमता होती है, जिसे समझ पाने की ज़िद्द को हम अपने से दूर धकेलते रहते हैं। नज़र का फ़ोकस जिस पर हुआ, बस उस चीज़ के ज़रा से हिस्से को उठा लेते हैं और अपने अंदर उतार लेते हैं।
ये एक पल को जीने की लालसा है, भूख है, कोशिश है, बैचेनी है। इसे अपनी दुनिया में टटोलिए, फिर अपने को समझने का दावा कीजिए।
हर शख़्स में ख़ुद तक पहुँचती एक वापस नज़र की तलब है। इस नज़र से शख़्सों की पहचान का कोई चिन्ह जुड़ा होता है। पहचान पत्र और दस्तावेज़ इन्हीं चिन्हों को आँकती रेखाएँ हैं। इन रेखाओं के आधार पर सत्ता हर शख़्स को अपने वर्गीय अंग से जुड़ा समझ कर याद रखती है। एक अवधी के बाद भूल भी जाती है, या भूल जाने का दावा कर देती है।
जगह-जगह अपने आप को दोहराने को कहा जाता है। पर दस्तावेज़ों के बिना पर ही नहीं, अपने सफ़र को दोहराने के तरीक़े और भी हैं।
26 May 2006
Rakesh Khairalia is a practitioner at the Dakshinpuri Lab.
चंद ज़रूरतों के बंधन में लिपटे रहने के बावजूद इस हसीन दुनिया में सांस लेने को जी चाहता है।
एक चटकारती आवाज़ मन में गूँजती है: "इस समाज के बाहर का जीना भी कोई जीवन है?"
समाज में अपने वजूद को पुख्ता करने में हर दिन बीतता जाता है। ज़िंदगी कहानियाँ बुनती रहती है, अपने जी पाने की वजह बनाने के लिए। समाज बना है सुखमय और सुंदर जीवन जी पाने की माँग पर। यहाँ हर भावना, हर जज़्बा अनमोल है। कोई अपने समय से रिश्ता रख कर किसी ख़्याली बुनाई में जीता रहता है, अपने आसपास में ढल रहा होता है।
शहर की जुस्तजू में शरीक होते शख़्स बौखलाती भीड़ के आलम में खो जाते हैं। वो अपने वजूद की सरहदों के ख़ुद ही निगहबान होते हैं। ये चौकन्नापन उन्हें उनकी जगह में महफ़ूज़ रखता है।
भीड़ के बीच हो रही नज़रों के टकराव में कुछ स्पर्श एक शख़्स से दूसरे शख़्स के भीतर हलचल पैदा करते हैं। जैसे बिना पासवर्ड के लोग एक-दूसरे को इस अजनबी शहर की भीड़ में ढूँढ रहे हों।
अगर इनकी गूँज सुन सकते हो तो सुनो, अगर इनकी परख किसी एहसास से कर सकते हो तो करो। वक़्त के किसी टुकड़े की परतों में तैरती सपनों की, चाहतों की पुकार को जियो और अपने जीवन में गिरती रोज़मर्रा की टेंशन की दस्तकों को मत ठुकराओ।
जहाँ रोज़मर्रा अपने अतीत की अंगुलियों को पकड़े जगह, समय, माहौल की आवाज़ों से मुखातिब होता रहता है, वहीं कल्पनाएँ अपने बंद दरवाज़ों पर रोज़मर्रा की आहटें महसूस कर के जीवन के फ़लसफ़ों का स्वाद चखा देती हैं। एक अदृश्य गति के घेरे मे अंकुरित हो रहे हम किसी विशालकाय पेड़ की शाखाओं की भांति फैलाव की ओर लगातार बढ़ते रहते हैं।
हम जो देख रहे होते हैं, जो महसूस कर रहे होते हैं, उसके पीछे एक असीमता होती है, जिसे समझ पाने की ज़िद्द को हम अपने से दूर धकेलते रहते हैं। नज़र का फ़ोकस जिस पर हुआ, बस उस चीज़ के ज़रा से हिस्से को उठा लेते हैं और अपने अंदर उतार लेते हैं।
ये एक पल को जीने की लालसा है, भूख है, कोशिश है, बैचेनी है। इसे अपनी दुनिया में टटोलिए, फिर अपने को समझने का दावा कीजिए।
हर शख़्स में ख़ुद तक पहुँचती एक वापस नज़र की तलब है। इस नज़र से शख़्सों की पहचान का कोई चिन्ह जुड़ा होता है। पहचान पत्र और दस्तावेज़ इन्हीं चिन्हों को आँकती रेखाएँ हैं। इन रेखाओं के आधार पर सत्ता हर शख़्स को अपने वर्गीय अंग से जुड़ा समझ कर याद रखती है। एक अवधी के बाद भूल भी जाती है, या भूल जाने का दावा कर देती है।
जगह-जगह अपने आप को दोहराने को कहा जाता है। पर दस्तावेज़ों के बिना पर ही नहीं, अपने सफ़र को दोहराने के तरीक़े और भी हैं।
26 May 2006
Rakesh Khairalia is a practitioner at the Dakshinpuri Lab.









