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Introduction

Bahurupiya Shehr ke lekhakon ke kuchh "KYUN" aur "KAISE".


आज हमारे साथ यहाँ शरीक़ होने के लिए आप सब का शुक्रिया। मेरा नाम यशोदा है, और मेरे साथ ये शमशेर है। हमारी सोच है कि इस किताब के बनने पर, किताब के बारे में आप सभी के कई सवाल होंगे। हमारे भी हैं। तो ये हैं, बहुरूपिया शहर के लेखकों के कुछ "क्यों" और "कैसे"।

शहर क्यों?

शहर रहने में नज़दीक और दोहराने में दूर है। ये दूरी ही शहर को दोहराने की चुनौती बनती है।

कैसे? - शहर के कई मुखौटे हैं। हर मुखौटे से बनती बहुरूपी छवियाँ। जैसे सैकड़ों बनती-बदलती परछाइयाँ एक-दूसरे को बिना जाने एक-दूसरे की हमसफ़र बनती हों। ना जानते हुए हमसफ़र होने से एक जिग्यासा है, एक चाहत का उबाल है। लिखने से, दोहराने से हम दूरी को ख़त्म करने की कोशिश करते हैं। अपना अकेलापन इस आकर्षण से टकराता है। दूरी को पास लाने से अनगिनत जोड़ों का उभार होने लगता है। देखने से बदल कर रिश्ता शहर से बोलने का बन जाता है। तब शहर ना नींद आने देती है, ना ही नींद से जागने देती है।

किताब क्यों?

हर किताब एक ठिकाना है। अपनी सोच को ज़िंदा रखने का एक ज़रिया है। किताब हर संदर्भ में अपना संदर्भ रचने की क्षमता रखती है। किताब चलती ज़िंदगी में कुछ ठहर कर खोने के पल दे जाती है। किताब से बहस की जाती है। किताब को नकारा जाता है, स्वीकारा जाता है। शहर की अस्वीकृति के बीच स्वीकृति मिलने की एक आस है ये किताब।

नाम क्यों?

बहुरुपिया! जो मेरे सामने बैठा है, वो वही है जो मुझे दिख रहा है? या यहाँ से निकल कर कुछ और भी है? बहुरुपियापन हर आकृति में अपना दम भरता है। क्या यहाँ ऐसा कोई है, जिसकी आकृति फ़िक्सड हो? या फ़िक्स्ड होने से उसमें छटपटाहट ना हो? नाम किसी चीज़ को चिन्हित करता है। पर बहुरूपिया का रिश्ता हर गुज़रती तस्वीर से है। नाम से चिन्हित करने से पहले हर अंदरूनी कसक को समझने को मुमकिन करने की एक कोशिश है। इसमें एक विशालता का अहसास भी है, एक कमज़ोरी की जगह भी। बहुरूपिया में वो साया भी है जिसे हम देखना नहीं चाहते।

लिखा कैसे?

बयाँ करने की जुंबा हमें हमारे आसपास और अपनों से ही मिली है। लिखना किसी की ज़िन्दगी में गिरना नहीं होता बल्कि आपके सामने दोहराये गए पलों, सवालों और किसी की कश्मकश में सोच के ज़रिये उतरना होता है; जिसमें हम अलहड़ तैराक की तरह हाथ-पैर मार कर सोच के किनारे खोजते रहते हैं और फिर उसके ढाँचे में खुद को बयाँ करने की चाहत को जोड़ने लगते हैं।

दाखिल होने में खुद से सवाल-जवाब की बौछार निरंतर चलती रहती है। दाखिल होने में दाखिला मायने नहीं रखता क्योंकि ये कोई एंट्री पास या कार्ड लिए नहीं होता जो आपके दाखिल होने को चिन्हित कर सके। लेकिन अपने अन्दर किसी को कैसे उतार रहे हैं वो मायने रखता है, ये उतारना हु-ब-हु को चुनौति देने वाला होता है।

अपनी सोच के गाइड हम खुद होते हैं। जगह हमसे कैसे परिचित हो रही है और हम जगह को अपने से कैसे परिचित करा रहे हैं, वो एक अतंरद्धंद लिये होता है। यह सब दिखने में भले ही स्पष्ट हो पर सोच में अस्पष्टता की मारा-मारी चलती रहती है क्योंकि सोचने में कोई भी सोच मुकम्मल नहीं हो पाती ।

हर शब्द जितना अपने में धकेलता है, उतना ही वो असीम उड़ान की तरफ ले जाने वाला भी होता है । जिस तरह हम सोच में बंदिशों की हदों को लाँघ जाते हैं, उसी तरह हम हर लाइन के साथ बुनियादी शहर अपने अन्दर बसाते और उजाड़ते चलते हैं।

चाहत, आदत, मज़ा और शौक लिखना मेरी चाहत नहीं - क्योंकि चाहत में हम अकेले होते है; ना आदत है क्योंकि आदत में बोरियत पीछा नहीं छोड़ती; मज़ा भी नहीं क्योंकि हर वक्त आप कुछ-न-कुछ नया तलाशने की लालसा लिये होते हैं, जो मज़ा देने वाला नहीं होता । शौक नहीं है क्योंकि शौक अइयाशी के अड्डे खोजता है। ये कुछ और है? एक जुनुनी हद तक अपने को खखोड़ने की जिग्यासा, जिसमें खुद से जूझने की उत्तेजना होती है और उस जूझने में हमारे साथ-साथ दूसरों की भी अनगिनत छवियाँ कुछ खास अहसास छोड़ जाती हैं।

कुछ भी समीप नहीं होता पर अचानक से हुआ हादसा या बदलाव शहर को स्वेटर की तरह उधेड़ कर रख देता है। जिसके आगे खड़े रहना आसान नहीं फिर हम उसके समक्ष खड़े रहने के लिये भाषा तलाशते है जो किसी चुनौती से कम नहीं होता।कभी तो हम माहौल में खुद को इतना उतार लेते है की उसमें मैं कहाँ हूँ वो पहचान पाना बहुत मुशकिल हो जाता है। चीजों में परिवर्तन लिखने की लालसा और जिग्यासा को बढ़ावा देता है और सोच में उत्तेजित होकर माहौल को रचने की क्षमता ।

पाठक क्यों?

हर कोई अपने संदर्भ में जीता है, जीने की कोशिश करता है। पढ़ना हमारी जमी हुई छवियों को बहस में लाता है, उनका रूप टटोलता है, उन्हें उकसाता है। पढ़ना अपने आप को देखने की अलग नज़र देता है। "मेरे" और "तुम्हारे" बाहर, पढ़ने में एक तीसरे संदर्भ के बीज पनपते हैं। कोई ऐसा तीसरा संदर्भ, जहाँ ज़िंदगियाँ दस्तक देकर कल्पना और हकीकत के बीच अपने मायने बनाती और तलाशती हैं।

यही लिखा क्यों?

हर जगह की अपनी ख़ासियत होती है, उन्ही ख़ासियत को इकट्ठा कर वो अपने बसने की और बसे रहने की ज़िद्द को ज़िंदा रखते हैं। लेख इन्हीं ज़िद्दों की चुनौती में है। इसके साथ समय जुड़ा है। जो निश्चित तौर से चलते समय में ही अपनी क्षमता नहीं रखता। अतीत, वर्तमान और भविष्य के समय का त्रिकोणिय-ट्रायएंगल है, जिसमें धुंधली और गाढ़ी यादों का चुनाव किया जाता है, उन्हें सींचा जाता है।

एक वक़्त, दूसरे वक़्त से भिन्न है। यही भिन्नता दो लेखों के बीच के अंतरद्वंद बनते हैं। उनको जितना उबाल देते हैँ, उतने सवाल भी करते हैं। लेखों के उबाल, सवाल, निर्णय, जगह का पैमाना तरह-तरह से उनमें सांस लेने की धड़कन है और पल-समय इस धड़कन की नब्ज़।

कुछ छोटी नब्ज़ होती है तो कुछ बड़ी नब्ज़ - यानि समय या पल। छोटे पल जब हज़ारों पल में जुड़ते हैं या शामील होते हैं तो लोगों के साथ-साथ हम खुद को भी पाते हैं। लेख इन्ही पलों के माप के पैमाने हैं। और छोटे पलों के स्केल में अपने आपको बड़ा पाने का अहसास होता है।

Read by Yashoda Singh+Shamsher Ali

Bahurupiya Shehr Launch/01 May 2007/India Habitat Centre/New Delhi
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