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समाज का शास्त्र बनाम हिन्दी का समाज


भारतीय भाषा कार्यक्रम: एक परिसंवाद

पिछले 7 मार्च नई दिल्ली स्थित शोध केंद्र विकासशील समाज अध्ययन पीठ (सेंटर फार दिस्टडी ऑव डिवेलपिंग सोसाइटीज़) ने अपने भारतीय भाषा कार्यक्रम का उदघाटन समारोह किया. इस महत्त्वाकांक्षी कार्यक्रम का उद्देश्य अधिकांशत: अंग्रेजी में लिखे जाने वाले समाजविज्ञान को हिन्दी और अन्य भारतीय भाषाओं में लाना है समारोह में अंतरराष्ट्रीय ख्याति के विद्वान प्रोफ़ेसर पार्थ चटर्जी ने कार्यक्रम के तत्वाधन में तैयार की जा रही है और वाणी प्रकाशन द्वारा प्रकाशित लोकचिंतन ग्रंथमाला की दो पुस्तकों आधुनिकता के आईने में दलित और लोकतंत्र के सात अध्याय का लोर्कापण किया. इसके बाद एक बहस शुरू हुई जिसका विषय था: हिन्दी और समाजविज्ञान का भविष्य. इस परिसंवाद में भाग लेने वाले वक्ताओं की विशेषता यह थी कि वे कहीं हिंदी और अन्य भारतीय भाषाओं में गंभीर विचार-सहित्य के विकास से जुड़े रहे हैं.पार्थ चटर्जी ने अपने कई चर्चित निबंध मूलत: अंग्रेजी में न लिखकर बांग्ला में लिखे हैं. मशहूर शिक्षाशास्त्त्री कृष्ण कुमार, लोकतंत्र और समाजवाद के अध्येता योगेंद्र यादव और भारतीय भाषा कार्यक्रम के संपादक अभय कुमार दुबे लगातार हिंदी में समाजविज्ञान रचने की समस्याओं से जुझते रहे हैं. हिन्दी के वरिष्ठ कवि और आलोचक अशोक वाजपेयी को श्रेय हैं कि उन्होंने महात्मा गांधी अंतरराष्ट्रीय हिन्दी विश्वविद्यालय की स्थापना करके इस पूरे आंदोलन को एक सांस्थानिक आयाम दिया है. लीक हटकर सोचने वाले दलित चिंतक चंद्रभान प्रसाद हिन्दी की गैर-आधुनिक प्रवृत्तियों को चुनौती देने के लिए जाने जाते हैं.सबॉल्टर्न इतिहासकार शाहिद अमीन पिछले कई वर्षो से निम्नवर्गीय प्रसंग के रूप में विख्यात सबॉल्टर्न सटडीज़ के हिन्दी में प्रकाशन की मुहिम सक्रिय रूप से चलाते रहे हैं. हिन्दी के शीर्ष आलोचक नामवर सिंह संभवत: उन गिनी-चुनी असाधारण शाख़्सियतों में से एक हैं जिन्होंने हिन्दी को विचार-साहित्य से जोड़ने में अग्रणी भूमिका निभाई है. परिसंवाद के आठ वक्तव्यों से कई विचारोत्तेजक सूत्र निकले. इनमें प्रमुख यह था कि संकट की शिकार हिन्दी है या समाजविज्ञान का क्षेत्र ही संकटग्रस्त है? इसी से जुड़ा हुआ द्वंद्व यह था कि जिस आधुनिकता के हाथों ये समाजविज्ञान गढ़े गए हैं, क्या हिन्दी का इतिहास खुद ही उस आधुनिकता के ख़िलाफ़ नहीं खड़ा है? वक्ताओं ने इस प्रश्न पर भी बहस की कि हिन्दी को गंभीर विचार की भाषा बनाने में अनुवाद की क्या भूमिका होगी? परिसंवाद में अपील की गई कि हिन्दी और अन्य भारतीय भाषाओं को ऐसे द्विभाषी समाजवैज्ञानिक की जरूरत है जो अकादमीय दायरों के लिए भले ही अंग्रेजी में लिखे, पर उस दायरे से बाहर के पाठकों के लिए भारतीय भाषाओं में भी लेखना करे. वक्तव्यों में इस तरह के लेखन का इतिहास भी उकेरा गया. सवाल पूछा गया कि द्विभाषी बनते-बनते भारतीय अभिजन ज्ञान की भाषा के रूप में केवल अंग्रेजी को ही मान्यता क्यों दे बैठे? वक्तव्यों ने उपनिवेशवाद की भूमिका, आधुनिकीकरण की प्रक्रिया और हिन्दी के इतिहास की चर्चा की यहां उन्हीं आठ भाषणों को ज्यों का त्यों पेश किया जा रहा है. आख़िरी वक्तव्य कार्यक्रम के श्रोताओं में से एक का प्रतिनिधि है जो बाद में लिखित रूप में मिला है. यह रविकांत का वक्तव्य है जो अध्ययन पीठ के शोध कार्यक्रम सराय में कार्यरत है. रविकांत ने हाल में ही दीवाने-ए-सराय श्रृंखला की पहली कड़ी का संपादन किया है.

पार्थ चटर्जी : द्विभाषीसमाजवैज्ञानिक की प्रतीक्षा!

अभय कुमार दुबे : भाषाई इंजीनियरिंग की करामात

कृष्ण कुमार : पहले नया समाजविज्ञान रचिए!

अशोक वाजपेयी : निराशा के कर्तव्य

चंद्रभान प्रसाद : हिन्दी में समाजचिंतन 'ऑब्जेक्टिव' नहीं हो सकता!

योगेंद्र यादव : संकट भाषा का नहीं, समाजशास्त्र का है!

शाहिद अमीन : ज़रा अपने भाषाई सरमाए पर फिर से ग़ौर कीजिए!

नामवर सिंह : अनुवाद दोयम दर्जे का काम नहीं!

रविकान्त : हिन्दी की घड़ी में अभी क्या बजा है? 
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